राजनीति या साहित्य ?राजनीति या शिक्षा ?
मन होता है की एक बहस चलायें कि क्या है जरूरी ?राजनीति या साहित्य| साहित्य ना रहे तो जीवन तो है और रहेगा ही |लेकिन राजनीति ना रहे तो आधुनिक राष्ट्र राज्य हो या आदिम कबीला राष्ट्र या फिर आम जन ,क्या इनका अस्तित्व क्या एक दिन भी संभव है ?सवाल बड़ा मौंजू है |और जवाब जब भी होगा ,संशय के घेरे हर वक़्त खड़े दिखाई देंगे |क्योंकि हर वक़्त एक सवाल मनुष्य के मन को मथ रहा है कि क्या दिया है अब तक हर वक़्त कि साथी बनी इस राजनीति ने |शायद जितना दिया है उससे अधिक छीना है इस राजनीति ने |
तो क्या लौटें साहित्य की ओर? क्या उम्मीद का सारा बोझ लाड दें हम साहित्य के ही मथ्थे और कहें बहुत रोमांस कर लिया तुने शब्दों और प्रकृति के साथ |अब ज़रा सत्य की कठोर शिला से सर टकरा के भी देखो |देखें तो कितनी ताकत भरी पड़ी है इस बाईस-तेईस इंच की खोपड़ी में |
लेकिन साहित्य की दुनिया में क्या राजनीति का दानव अपना जबड़ा खोले नहीं बैठा है |कौन कह सकता है नहीं |कभी -कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि राजनीति से ही मानव की सत्ता है |राजनीति से मनुष्य मनुष्य है |राजनीति नहीं होती तो वो ठीक वैसे ही मिट जाता जैसे सांस बंद हो जाए तो जीवन मिट जाए |
किसी भी हाल में जीवन बचाना है क्योंकि जीवन है तो एक उम्मीद है कि कभी तो बदलेगा ये सब |कभी तो उम्मीद लौ टिम टिमआएगी और हमसे कहेगी कि मैं बुझी नहीं हूँ और न कभी बुझुंगी |
तब क्यों चलने दें हम राजनीति इस सत्ता को हीक्योंकि जब कहीं भी छुटकारा नहीं है इससे तो क्यों नहीं उसके आगे हम दोस्ती का हाथ फैलाएं और उसके सामने आकर कहें -मुझसे दोस्ती करोगी ?|
रविवार, 22 नवंबर 2009
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