शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

कुछ सवाल

कुछ सवाल हैं मेरे जेहन में
अभी कुछ दिनों पहले देश के एक नामी गिरामी हिन्दी दैनिक अखबार ने देश -विदेश की नामी हस्तियों को को दिल्ली में एक मंच पर इकठ्ठा हुए थे कहा गया की इन्हे देश के सामने उठ रही समस्याओं पर बातचीत कराने के लिए इकठ्ठा किया गया है खुशी होती है ऐसे आयोजनों को देखकर लेकिन एक सवाल बार -बार गूंजता है जेहन में ,कुछ बातें हैं जो कुछ याद दिलाकर चुभन का एहसास दिलाती हैं ये वही अखबार है दोस्तों जो अक्सर अपने पहले पन्ने पर जहाँ देश की सबसे प्रमुख खबरें होती हैं वहाँ किसी कंपनी का झूठा विज्ञापन रहता है ये क्या मेसेज देना चाहते हैं हमारे प्रमुख अखबार हमें ?क्या अब थोडी सी भी शर्मो हया नहीं बची है हमारे अखबारों के अन्दर ?हम कैसे समझें की कौन सी ख़बर ख़बर है और कौन सी ख़बर विज्ञापन
कुछ लोग जिनके हाथों में पैसे की ताकत है क्या वो लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को भी अपनी दासी बना लेंगे ?फिर क्या होगा अभिव्यक्ति की आजादी का क्या कहें अपनी बदनसीबी को की हम एक ऐसे समय में जीने को अभिशप्त हैं जब सच-झूठ एक दुसरे में इस तरह से घुलमिल गए हैं की हम सब हक्के-बक्के से खड़े तमाशा सा देखते रहते हैं

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