"मांझी नैया दूंढ़े किनारा |---
मांझी नैया ढूंढें किनारा ----
कोई तो ऐसी मौज नहीं
जिसको किसी कि खोज नहीं ? ?
कोई न कोई तो हर किसी को लगता है प्यारा -----???
मांझी नैया ढूंढें किनारा --
"
हाँ कितना सच है ये !
हर किसी को कोई न कोई तो प्यारा लगता ही है
चाँद आकाश में खामोश घूमता रहता है
क्यों ?
क्या उसका भी
कोई खो गया है मांझी ?
क्या तनहा नहीं है चाँद भी ?
और ये धीरे -धीरे बहती हवाएं !
क्या ये भी ढूँढती हैं
कोई किनारा !
कोई तो आये जो थाम ले
हवाओं के हाथ !
कोई तो आये जो
ले चले साथ और
थमा दे हाथ
किन्ही किनारों को !
हर किसी को
क्यों होती है तलाश
किनारों की!मांझी की !पतवार की !
जीवन तो करता है
अठखेलियाँ |
इन लहरों में !
ये उठती गिरती लहरें !
मन में भरती
न जाने कितने रंग
सुनहरे !
हाँ ये
उठती गिरती लहरे
न जाने कितने ख्वाब जगाती है
कितने गीत बनाती हैं !
कितने मीत बुलाती हैं !
ये लहरें !
हाँ ये लहरें
न जाने ,जब शाम ढले
तब कितनी बार रुलाती हैं !
कितने प्यार के हाथ छूडाती हैं!
मिलन और जुदाई के
न जाने कितने किस्से
बनाती हैं !
शायद इसीलिए मन अक्सर
किनारे ढूँढता है
दिल!---जिसे अक्सर टूटना है
रोने को खूबसूरत
सहारे ढूँढता है !
शायद इसीलिए वो रो -रो कर
मांझी और पतवारें ढूँढता है !
हाँ !--- मांझी ! मेरी भी नैया
किनारे ढूंढ रही है!
रोने को सहारे ढूंढ रही है !--
ऐ मांझी !
तू ले चल मुझे भी
उस किनारे पर
लेकिन लहरों को
भूलना मत !
बल्कि ठहर जाना
पल भर के लिए
इन लहराती ,इठलाती ,बलखाती
लहरों के बीच
ताकि भींग सकूं मैं
भी !क्योंकि ना जाने
फिर कब छोड़ें मेरा हाथ किनारे और
ना जाने फिर कब
लहरों की मुहब्बत
भिंगोये मेरा दामन !
अरे !लहरों से ही तो है
जीवन !
शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
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