ये सब क्या नाटक है भाई ?लिब्रहान आयोग, २६/११, मंहगाई ,शेयर मार्केट ये सब क्या है भाई ?ये अखबार वाले भाई भी कमाल करते हैं भाई |इन्हें क्या कोई खबर नहीं मिलती|क्या सारा देश इन्ही तीन -चार शब्दों के चक्रव्यूह में जा अटका है ?अरे भाई हर सुबह एक ही खबर पढ़ते -पढ़ते हम तो झल्लाहट से भरे पड़े हैं भाई|पागल होने -होने को हो जाता है मेरा दिमाग |
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
रविवार, 22 नवंबर 2009
rajaniti yaa sahitya
राजनीति या साहित्य ?राजनीति या शिक्षा ?
मन होता है की एक बहस चलायें कि क्या है जरूरी ?राजनीति या साहित्य| साहित्य ना रहे तो जीवन तो है और रहेगा ही |लेकिन राजनीति ना रहे तो आधुनिक राष्ट्र राज्य हो या आदिम कबीला राष्ट्र या फिर आम जन ,क्या इनका अस्तित्व क्या एक दिन भी संभव है ?सवाल बड़ा मौंजू है |और जवाब जब भी होगा ,संशय के घेरे हर वक़्त खड़े दिखाई देंगे |क्योंकि हर वक़्त एक सवाल मनुष्य के मन को मथ रहा है कि क्या दिया है अब तक हर वक़्त कि साथी बनी इस राजनीति ने |शायद जितना दिया है उससे अधिक छीना है इस राजनीति ने |
तो क्या लौटें साहित्य की ओर? क्या उम्मीद का सारा बोझ लाड दें हम साहित्य के ही मथ्थे और कहें बहुत रोमांस कर लिया तुने शब्दों और प्रकृति के साथ |अब ज़रा सत्य की कठोर शिला से सर टकरा के भी देखो |देखें तो कितनी ताकत भरी पड़ी है इस बाईस-तेईस इंच की खोपड़ी में |
लेकिन साहित्य की दुनिया में क्या राजनीति का दानव अपना जबड़ा खोले नहीं बैठा है |कौन कह सकता है नहीं |कभी -कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि राजनीति से ही मानव की सत्ता है |राजनीति से मनुष्य मनुष्य है |राजनीति नहीं होती तो वो ठीक वैसे ही मिट जाता जैसे सांस बंद हो जाए तो जीवन मिट जाए |
किसी भी हाल में जीवन बचाना है क्योंकि जीवन है तो एक उम्मीद है कि कभी तो बदलेगा ये सब |कभी तो उम्मीद लौ टिम टिमआएगी और हमसे कहेगी कि मैं बुझी नहीं हूँ और न कभी बुझुंगी |
तब क्यों चलने दें हम राजनीति इस सत्ता को हीक्योंकि जब कहीं भी छुटकारा नहीं है इससे तो क्यों नहीं उसके आगे हम दोस्ती का हाथ फैलाएं और उसके सामने आकर कहें -मुझसे दोस्ती करोगी ?|
मन होता है की एक बहस चलायें कि क्या है जरूरी ?राजनीति या साहित्य| साहित्य ना रहे तो जीवन तो है और रहेगा ही |लेकिन राजनीति ना रहे तो आधुनिक राष्ट्र राज्य हो या आदिम कबीला राष्ट्र या फिर आम जन ,क्या इनका अस्तित्व क्या एक दिन भी संभव है ?सवाल बड़ा मौंजू है |और जवाब जब भी होगा ,संशय के घेरे हर वक़्त खड़े दिखाई देंगे |क्योंकि हर वक़्त एक सवाल मनुष्य के मन को मथ रहा है कि क्या दिया है अब तक हर वक़्त कि साथी बनी इस राजनीति ने |शायद जितना दिया है उससे अधिक छीना है इस राजनीति ने |
तो क्या लौटें साहित्य की ओर? क्या उम्मीद का सारा बोझ लाड दें हम साहित्य के ही मथ्थे और कहें बहुत रोमांस कर लिया तुने शब्दों और प्रकृति के साथ |अब ज़रा सत्य की कठोर शिला से सर टकरा के भी देखो |देखें तो कितनी ताकत भरी पड़ी है इस बाईस-तेईस इंच की खोपड़ी में |
लेकिन साहित्य की दुनिया में क्या राजनीति का दानव अपना जबड़ा खोले नहीं बैठा है |कौन कह सकता है नहीं |कभी -कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि राजनीति से ही मानव की सत्ता है |राजनीति से मनुष्य मनुष्य है |राजनीति नहीं होती तो वो ठीक वैसे ही मिट जाता जैसे सांस बंद हो जाए तो जीवन मिट जाए |
किसी भी हाल में जीवन बचाना है क्योंकि जीवन है तो एक उम्मीद है कि कभी तो बदलेगा ये सब |कभी तो उम्मीद लौ टिम टिमआएगी और हमसे कहेगी कि मैं बुझी नहीं हूँ और न कभी बुझुंगी |
तब क्यों चलने दें हम राजनीति इस सत्ता को हीक्योंकि जब कहीं भी छुटकारा नहीं है इससे तो क्यों नहीं उसके आगे हम दोस्ती का हाथ फैलाएं और उसके सामने आकर कहें -मुझसे दोस्ती करोगी ?|
शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
kinaaraa
"मांझी नैया दूंढ़े किनारा |---
मांझी नैया ढूंढें किनारा ----
कोई तो ऐसी मौज नहीं
जिसको किसी कि खोज नहीं ? ?
कोई न कोई तो हर किसी को लगता है प्यारा -----???
मांझी नैया ढूंढें किनारा --
"
हाँ कितना सच है ये !
हर किसी को कोई न कोई तो प्यारा लगता ही है
चाँद आकाश में खामोश घूमता रहता है
क्यों ?
क्या उसका भी
कोई खो गया है मांझी ?
क्या तनहा नहीं है चाँद भी ?
और ये धीरे -धीरे बहती हवाएं !
क्या ये भी ढूँढती हैं
कोई किनारा !
कोई तो आये जो थाम ले
हवाओं के हाथ !
कोई तो आये जो
ले चले साथ और
थमा दे हाथ
किन्ही किनारों को !
हर किसी को
क्यों होती है तलाश
किनारों की!मांझी की !पतवार की !
जीवन तो करता है
अठखेलियाँ |
इन लहरों में !
ये उठती गिरती लहरें !
मन में भरती
न जाने कितने रंग
सुनहरे !
हाँ ये
उठती गिरती लहरे
न जाने कितने ख्वाब जगाती है
कितने गीत बनाती हैं !
कितने मीत बुलाती हैं !
ये लहरें !
हाँ ये लहरें
न जाने ,जब शाम ढले
तब कितनी बार रुलाती हैं !
कितने प्यार के हाथ छूडाती हैं!
मिलन और जुदाई के
न जाने कितने किस्से
बनाती हैं !
शायद इसीलिए मन अक्सर
किनारे ढूँढता है
दिल!---जिसे अक्सर टूटना है
रोने को खूबसूरत
सहारे ढूँढता है !
शायद इसीलिए वो रो -रो कर
मांझी और पतवारें ढूँढता है !
हाँ !--- मांझी ! मेरी भी नैया
किनारे ढूंढ रही है!
रोने को सहारे ढूंढ रही है !--
ऐ मांझी !
तू ले चल मुझे भी
उस किनारे पर
लेकिन लहरों को
भूलना मत !
बल्कि ठहर जाना
पल भर के लिए
इन लहराती ,इठलाती ,बलखाती
लहरों के बीच
ताकि भींग सकूं मैं
भी !क्योंकि ना जाने
फिर कब छोड़ें मेरा हाथ किनारे और
ना जाने फिर कब
लहरों की मुहब्बत
भिंगोये मेरा दामन !
अरे !लहरों से ही तो है
जीवन !
मांझी नैया ढूंढें किनारा ----
कोई तो ऐसी मौज नहीं
जिसको किसी कि खोज नहीं ? ?
कोई न कोई तो हर किसी को लगता है प्यारा -----???
मांझी नैया ढूंढें किनारा --
"
हाँ कितना सच है ये !
हर किसी को कोई न कोई तो प्यारा लगता ही है
चाँद आकाश में खामोश घूमता रहता है
क्यों ?
क्या उसका भी
कोई खो गया है मांझी ?
क्या तनहा नहीं है चाँद भी ?
और ये धीरे -धीरे बहती हवाएं !
क्या ये भी ढूँढती हैं
कोई किनारा !
कोई तो आये जो थाम ले
हवाओं के हाथ !
कोई तो आये जो
ले चले साथ और
थमा दे हाथ
किन्ही किनारों को !
हर किसी को
क्यों होती है तलाश
किनारों की!मांझी की !पतवार की !
जीवन तो करता है
अठखेलियाँ |
इन लहरों में !
ये उठती गिरती लहरें !
मन में भरती
न जाने कितने रंग
सुनहरे !
हाँ ये
उठती गिरती लहरे
न जाने कितने ख्वाब जगाती है
कितने गीत बनाती हैं !
कितने मीत बुलाती हैं !
ये लहरें !
हाँ ये लहरें
न जाने ,जब शाम ढले
तब कितनी बार रुलाती हैं !
कितने प्यार के हाथ छूडाती हैं!
मिलन और जुदाई के
न जाने कितने किस्से
बनाती हैं !
शायद इसीलिए मन अक्सर
किनारे ढूँढता है
दिल!---जिसे अक्सर टूटना है
रोने को खूबसूरत
सहारे ढूँढता है !
शायद इसीलिए वो रो -रो कर
मांझी और पतवारें ढूँढता है !
हाँ !--- मांझी ! मेरी भी नैया
किनारे ढूंढ रही है!
रोने को सहारे ढूंढ रही है !--
ऐ मांझी !
तू ले चल मुझे भी
उस किनारे पर
लेकिन लहरों को
भूलना मत !
बल्कि ठहर जाना
पल भर के लिए
इन लहराती ,इठलाती ,बलखाती
लहरों के बीच
ताकि भींग सकूं मैं
भी !क्योंकि ना जाने
फिर कब छोड़ें मेरा हाथ किनारे और
ना जाने फिर कब
लहरों की मुहब्बत
भिंगोये मेरा दामन !
अरे !लहरों से ही तो है
जीवन !
ishwar mar gayaa ?
"किस अभागे को अरे इस धुप में दफना रहे हो ?
और इसकी मौत पर
क्यों ख़ुशी से चिल्ला रहे हो ?
कौन है ऐसा बिचारा
दे बता ?"
"मर गया ईश्वर नहीं तुमको पता ?"
"मर गया ईश्वर ?"
ईश्वर कि जिसने स्वंय अपने हाथ से
धरती बसाई
चाँद और सूरज बनाये
पर्वतों के , झीलों के,
सागर और द्वीपों के
नक़्शे उभारे
ऊंचे -ऊंचे गिरी-शिखरों पर
बर्फ जमाई
और उनकी ,लम्बी छाहों में
नदियों के डोरों से सी कर
वन, उपवन ,ऊसर , परती कि
भूरी हरी थिगलियों
वाले ,
कंथइ से मैदान बिछाए ----
ईश्वर कि जिसने आदमी पैदा किया
क्या वही अब मर गया ?"
"हाँ , मर गया ईश्वर कि उसके त्रास सारे मर गए
सृष्टि के आरम्भ से चलते हुए
आदमी के खून पर पलते हुए
अन्याय के इतिहास सारे मर गए "
"मर गया ईश्वर कि उसके धर्म सारे मर गए
स्वर्ग -नरक के ,पाप -पुण्य के
पुनर्जन्म और कर्मवाद के
वहम सारे मर गए !
"मर गया ईश्वर,विषमता का सहायक मर गया
आदमी के हाथ में ही आदमी भाग्य देकर
विश्व का दैवी विधायक मर गया
मर गया ईश्वर !"
"यह हुआ कैसे मगर ?"
"साइंस कि किरणों ने मारा मर गया
वहम का पर्दा उघाडा ,मर गया
जब तलक पूजा अँधेरे में उसे
ज़िंदा रहा
रोशनी के सामने ज्यों ही पुकारा ,मर गया !"
"खैर अच्छा था बिचारा मर गया "
और इसकी मौत पर
क्यों ख़ुशी से चिल्ला रहे हो ?
कौन है ऐसा बिचारा
दे बता ?"
"मर गया ईश्वर नहीं तुमको पता ?"
"मर गया ईश्वर ?"
ईश्वर कि जिसने स्वंय अपने हाथ से
धरती बसाई
चाँद और सूरज बनाये
पर्वतों के , झीलों के,
सागर और द्वीपों के
नक़्शे उभारे
ऊंचे -ऊंचे गिरी-शिखरों पर
बर्फ जमाई
और उनकी ,लम्बी छाहों में
नदियों के डोरों से सी कर
वन, उपवन ,ऊसर , परती कि
भूरी हरी थिगलियों
वाले ,
कंथइ से मैदान बिछाए ----
ईश्वर कि जिसने आदमी पैदा किया
क्या वही अब मर गया ?"
"हाँ , मर गया ईश्वर कि उसके त्रास सारे मर गए
सृष्टि के आरम्भ से चलते हुए
आदमी के खून पर पलते हुए
अन्याय के इतिहास सारे मर गए "
"मर गया ईश्वर कि उसके धर्म सारे मर गए
स्वर्ग -नरक के ,पाप -पुण्य के
पुनर्जन्म और कर्मवाद के
वहम सारे मर गए !
"मर गया ईश्वर,विषमता का सहायक मर गया
आदमी के हाथ में ही आदमी भाग्य देकर
विश्व का दैवी विधायक मर गया
मर गया ईश्वर !"
"यह हुआ कैसे मगर ?"
"साइंस कि किरणों ने मारा मर गया
वहम का पर्दा उघाडा ,मर गया
जब तलक पूजा अँधेरे में उसे
ज़िंदा रहा
रोशनी के सामने ज्यों ही पुकारा ,मर गया !"
"खैर अच्छा था बिचारा मर गया "
सोमवार, 9 नवंबर 2009
premchand aur agyeya men kaun shreshtha
हिन्दी साहित्य के कथाजगत में दो महान लेखकों के बीच पता नहीं क्यों आज एक तुलना करने कपो जी चाहता है .बहुत पहले मेरी इच्छा थी की मैं अज्ञेय जी को उपन्यास साहित्य में प्रेमचंद से श्रेष्ठ साबित करूँ क्योंकि शेखर :एक जीवनी| हो या नदी के द्वीप इन दोनों उपन्यासों को पढ़ते हुए मुझे बार -बार एक अजीब सा ख्याल आता रहा कि क्या प्रेमचंद चाहकर भी शेखर :एक जीवनी या नदी के द्वीप लिख पाते .उत्तर नकारात्मक ही पाता हूँ |
साहित्य कि दुनिया के दोस्तों |मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि हम सब एक नै बहस को जन्म दें कि श्रेष्ठ कौन?प्रेमचंद या अज्ञेय ?
साहित्य कि दुनिया के दोस्तों |मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि हम सब एक नै बहस को जन्म दें कि श्रेष्ठ कौन?प्रेमचंद या अज्ञेय ?
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
कुछ सवाल
कुछ सवाल हैं मेरे जेहन में
अभी कुछ दिनों पहले देश के एक नामी गिरामी हिन्दी दैनिक अखबार ने देश -विदेश की नामी हस्तियों को को दिल्ली में एक मंच पर इकठ्ठा हुए थे कहा गया की इन्हे देश के सामने उठ रही समस्याओं पर बातचीत कराने के लिए इकठ्ठा किया गया है खुशी होती है ऐसे आयोजनों को देखकर लेकिन एक सवाल बार -बार गूंजता है जेहन में ,कुछ बातें हैं जो कुछ याद दिलाकर चुभन का एहसास दिलाती हैं ये वही अखबार है दोस्तों जो अक्सर अपने पहले पन्ने पर जहाँ देश की सबसे प्रमुख खबरें होती हैं वहाँ किसी कंपनी का झूठा विज्ञापन रहता है ये क्या मेसेज देना चाहते हैं हमारे प्रमुख अखबार हमें ?क्या अब थोडी सी भी शर्मो हया नहीं बची है हमारे अखबारों के अन्दर ?हम कैसे समझें की कौन सी ख़बर ख़बर है और कौन सी ख़बर विज्ञापन
कुछ लोग जिनके हाथों में पैसे की ताकत है क्या वो लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को भी अपनी दासी बना लेंगे ?फिर क्या होगा अभिव्यक्ति की आजादी का क्या कहें अपनी बदनसीबी को की हम एक ऐसे समय में जीने को अभिशप्त हैं जब सच-झूठ एक दुसरे में इस तरह से घुलमिल गए हैं की हम सब हक्के-बक्के से खड़े तमाशा सा देखते रहते हैं
अभी कुछ दिनों पहले देश के एक नामी गिरामी हिन्दी दैनिक अखबार ने देश -विदेश की नामी हस्तियों को को दिल्ली में एक मंच पर इकठ्ठा हुए थे कहा गया की इन्हे देश के सामने उठ रही समस्याओं पर बातचीत कराने के लिए इकठ्ठा किया गया है खुशी होती है ऐसे आयोजनों को देखकर लेकिन एक सवाल बार -बार गूंजता है जेहन में ,कुछ बातें हैं जो कुछ याद दिलाकर चुभन का एहसास दिलाती हैं ये वही अखबार है दोस्तों जो अक्सर अपने पहले पन्ने पर जहाँ देश की सबसे प्रमुख खबरें होती हैं वहाँ किसी कंपनी का झूठा विज्ञापन रहता है ये क्या मेसेज देना चाहते हैं हमारे प्रमुख अखबार हमें ?क्या अब थोडी सी भी शर्मो हया नहीं बची है हमारे अखबारों के अन्दर ?हम कैसे समझें की कौन सी ख़बर ख़बर है और कौन सी ख़बर विज्ञापन
कुछ लोग जिनके हाथों में पैसे की ताकत है क्या वो लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को भी अपनी दासी बना लेंगे ?फिर क्या होगा अभिव्यक्ति की आजादी का क्या कहें अपनी बदनसीबी को की हम एक ऐसे समय में जीने को अभिशप्त हैं जब सच-झूठ एक दुसरे में इस तरह से घुलमिल गए हैं की हम सब हक्के-बक्के से खड़े तमाशा सा देखते रहते हैं
सोमवार, 2 नवंबर 2009
आरम्भ
आवाज और शब्द की दुनिया के दोस्तों को मेरा नमस्कार साथियों मैं हूँ अमर ,काम से नहीं सिर्फ़ नाम से \पता नहीं माँ-बाप बच्चों का नाम इतना बेवकूफी भरा क्यों रख देते हैं अमर --भाई वाह करोड़ों वर्षों तक दानवों ने कोशिश की कि वे अमर हो जाएँ लेकिन अंत में निराशा ही हाथ लगी और मैं भला कैसे जन्म लेते ही अमर हो गया ये तो मेरे माँ बाप ही बता सकते हैं तो साथियों ये सवाल छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं और आते हैं राइट वाइस पर
सब कुछ ग़लत है जहाँ वहाँ कोई आवाज सही कैसे हो सकती है ?लेकिन है एक सही आवाज उसे मैं सुनाता हूँ आज भी ,कल भी और हर रोज भी तो इंतजार कीजिये सही आवाज का
सब कुछ ग़लत है जहाँ वहाँ कोई आवाज सही कैसे हो सकती है ?लेकिन है एक सही आवाज उसे मैं सुनाता हूँ आज भी ,कल भी और हर रोज भी तो इंतजार कीजिये सही आवाज का
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