"किस अभागे को अरे इस धुप में दफना रहे हो ?
और इसकी मौत पर
क्यों ख़ुशी से चिल्ला रहे हो ?
कौन है ऐसा बिचारा
दे बता ?"
"मर गया ईश्वर नहीं तुमको पता ?"
"मर गया ईश्वर ?"
ईश्वर कि जिसने स्वंय अपने हाथ से
धरती बसाई
चाँद और सूरज बनाये
पर्वतों के , झीलों के,
सागर और द्वीपों के
नक़्शे उभारे
ऊंचे -ऊंचे गिरी-शिखरों पर
बर्फ जमाई
और उनकी ,लम्बी छाहों में
नदियों के डोरों से सी कर
वन, उपवन ,ऊसर , परती कि
भूरी हरी थिगलियों
वाले ,
कंथइ से मैदान बिछाए ----
ईश्वर कि जिसने आदमी पैदा किया
क्या वही अब मर गया ?"
"हाँ , मर गया ईश्वर कि उसके त्रास सारे मर गए
सृष्टि के आरम्भ से चलते हुए
आदमी के खून पर पलते हुए
अन्याय के इतिहास सारे मर गए "
"मर गया ईश्वर कि उसके धर्म सारे मर गए
स्वर्ग -नरक के ,पाप -पुण्य के
पुनर्जन्म और कर्मवाद के
वहम सारे मर गए !
"मर गया ईश्वर,विषमता का सहायक मर गया
आदमी के हाथ में ही आदमी भाग्य देकर
विश्व का दैवी विधायक मर गया
मर गया ईश्वर !"
"यह हुआ कैसे मगर ?"
"साइंस कि किरणों ने मारा मर गया
वहम का पर्दा उघाडा ,मर गया
जब तलक पूजा अँधेरे में उसे
ज़िंदा रहा
रोशनी के सामने ज्यों ही पुकारा ,मर गया !"
"खैर अच्छा था बिचारा मर गया "
शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
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